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“नवीन समाज निर्माण में शिक्षक का परिवर्तनीय योगदान”

शीर्षक   “नवीन समाज निर्माण में शिक्षक का परिवर्तनीय योगदान” लेखक जितिन साबु .  (बी.एड. छात्र, एल.आई.सी.टी.ई. मरंगट्टुपिल्ली) सारांश                      आज का समाज निरंतर परिवर्तन, वैश्वीकरण और तकनीकी उन्नति से गुजर रहा है। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज के नैतिक, तकनीकी और मानवीय विकास का नेतृत्व करता है। इस लेख में आधुनिक समाज में शिक्षक की बहुआयामी भूमिकाओं—जैसे मार्गदर्शन, तकनीकी दक्षता, नैतिक मूल्यों का संवहन, समावेशी शिक्षा, शोध, नवाचार, और सामाजिक परिवर्तन—का विश्लेषण किया गया है। यह लेख शिक्षक की बदलती भूमिका को समझने और भविष्य के समाज में उसकी आवश्यकताओं को पहचानने का प्रयास है। मुख्य शब्द ज्ञानदाता मार्गदर्शक तकनीकी दक्षता नैतिक मूल्य समावेशी शिक्षा नवाचारी शिक्षक समाज परिवर्तन जीवन कौशल सांस्कृतिक विविधता आजीवन शिक्षार्थी लेख परिचय               शिक्षक को समाज का निर्माता कहा जाता है, क्योंकि वह केवल ज्ञान प्रदान नहीं करता, बल्कि वि...
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समय सरगम

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समय सरगम सन २००० में प्रकाशित उपन्यास ‘समय सरगम’ कृष्णा सोबती का मुख्यतः एक पीढ़ी विशेष पर केन्द्रित उपन्यास है। इक्कीस खंड की सहूलियत में विभाजित इस उपन्यास के मुख्य पात्र आरण्या और ईशान हैं। जीवन के मुहाने पर खड़े ये दो बुजुर्ग अपने जीवन के बचे हुए समय की सरगम को बाकी चिन्ताओ से परे छटक पूरी उमंग के साथ सुनने को सजग हैं, साथ ही पक चुकी उम्र को जीने की सतर्कता और दिनचर्या की वाजिब सावधानी को निहायत ही संजीदगी से बरतते हुए। कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘समय सरगम’ की केंद्रीय संवेदना में बूढ़े लोगों का संसार है। मृत्यु को लेकर कातर चिंताएं हैं। भय है। लेकिन आतंक नहीं है। अंतिम परिणति के रूप में उसका स्वीकार है। चिंतन की ये दोनों मुद्राएं रचनाकार के जीवन दर्शन को कमोबेश अभिव्यक्त करती हैं। लेखिका का विश्वास मानव की अमरता में है। अनंत में विलीन होने तक पल पल जीने की उत्कंठा और उत्साह का भाव ही ‘समय सरगम‘ की अंतर्वस्तु है। ‘समय सरगम’ वृद्धों और वृद्ध होते लोगों की कहानी है, जो इस संसार में अकेले हैं। यह अकेले होना भी कई स्तरों पर है – कुछ अकेले हैं क्योंकि उनका कोई परिवार नहीं, कुछ इसलिए अकेले है...