समय सरगम
सन २००० में प्रकाशित उपन्यास ‘समय सरगम’ कृष्णा सोबती का मुख्यतः एक पीढ़ी विशेष पर केन्द्रित उपन्यास है। इक्कीस खंड की सहूलियत में विभाजित इस उपन्यास के मुख्य पात्र आरण्या और ईशान हैं। जीवन के मुहाने पर खड़े ये दो बुजुर्ग अपने जीवन के बचे हुए समय की सरगम को बाकी चिन्ताओ से परे छटक पूरी उमंग के साथ सुनने को सजग हैं, साथ ही पक चुकी उम्र को जीने की सतर्कता और दिनचर्या की वाजिब सावधानी को निहायत ही संजीदगी से बरतते हुए।
कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘समय सरगम’ की केंद्रीय संवेदना में बूढ़े लोगों का संसार है। मृत्यु को लेकर कातर चिंताएं हैं। भय है। लेकिन आतंक नहीं है। अंतिम परिणति के रूप में उसका स्वीकार है। चिंतन की ये दोनों मुद्राएं रचनाकार के जीवन दर्शन को कमोबेश अभिव्यक्त करती हैं। लेखिका का विश्वास मानव की अमरता में है। अनंत में विलीन होने तक पल पल जीने की उत्कंठा और उत्साह का भाव ही ‘समय सरगम‘ की अंतर्वस्तु है।
‘समय सरगम’ वृद्धों और वृद्ध होते लोगों की कहानी है, जो इस संसार में अकेले हैं। यह अकेले होना भी कई स्तरों पर है – कुछ अकेले हैं क्योंकि उनका कोई परिवार नहीं, कुछ इसलिए अकेले हैं क्योंकि उनका परिवार उनसे दूर है और कुछ परिवार में होकर भी अकेले कर दिए गए हैं। क्योंकि परिवार के लिए अब वो अतिरिक्त हो चुके हैं, उनकी कोई उपादेयता अब नहीं रही या यूँ कहें कि नई पीढ़ी की नज़र में उनकी उपादेयता या महत्व को अब नगण्य समझा जाता है।
इस उपन्यास में प्रमुख रूप से अकेलेपन, आर्थिक समस्या, प्रौढ़ कुमारियों की समस्या, अधिकार से वंचित नारी की समस्या, आधुनिक जीवन जीने की समस्या, प्रेम की समस्या, संयुक्त परिवार, परिवार में बुजुर्गों की भूमिका, वर्तमान पारिवारिक माहौल में उनकी वास्तविक स्थिति आदि को कई प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया गया है।
उपन्यास में सयानों की कुछ सामाजिक चिंताएं भी हैं। अट्टालिकाओं और झुग्गियों की असमानता पर दुःख है। समानता और बराबरी के सपने हैं। प्रदूषण, लूट खसोट और मारकाट पर बौद्धिक बहसें हैं, यह स्पष्ट है कि इस धरती के मनुष्यों को मनुष्य ही बचा सकते हैं, परमाणु हथियार नहीं। नियतिवादी या भाग्यवादी होना किसी समस्या का समाधान नहीं। कुछ सयानों में सामाजिक चैतन्य ही नहीं समाज के प्रति दायित्व बोध भी है।
‘समय सरगम’ भाषिक सामर्थ्य की एक दृष्टांत है। संतुलित वाक्य विन्यास, शब्दों के सटीक प्रयोग, गद्य और पद्य के बंधन को तोड़ती भाषा – जैसे गद्य में पद्य की कसीदाकारी की गयी हो। इन सब विशिष्टताओं के बावजूद उपन्यास में कुछ उजड़ापन सा है। शायद सयानों की एकाकी दुनिया के कारण।
कृष्णा सोबती इस उपन्यास के माध्यम से यही संदेश देती है, समय के साथ चलना होगा। अन्यथा समय आगे निकल जायेगा और हम पीछे रह जायेंगे। जीने की अदम्य जिजीविषा और संतोष की कथा है ‘समय सरगम‘। समय जो जीवन के हर रंग को लेकर चलता है। हमे हर रंग से रंगना चाहिए तभी समय का महत्व समझ में आएगा – दुःख के भोग के बाद ही सुख का आनंद मिलेगा, वियोग के बाद ही मिलन की तृप्ति समझ आएगी, अधूरेपन के बाद ही पूर्णता का भान होगा।
कृष्णा सोबती का उपन्यास संसार काफी प्रासंगिक और सार्थक है, इसमें वर्णित स्त्री चरित्र वर्तमान नारी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। ‘समय सरगम’ कृष्णा सोबती की परिपक्व अवस्था की अनुभूतियों का महाकाव्य है। यह एक ऐसा बहुमूल्य उपन्यास है जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रौढ़ावस्था की उन स्थितियों का निरूपण करता है, जो कि प्रत्येक मानव के जीवन में घटित हो रही है या होने वाली है। यह उपन्यास समाज की उस दुखती रग पर पाँव रखता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को गुजरना है। इसके माध्यम से लेखिका ने जो बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, सामाजिक और नैतिक बहसें, साहित्यिक संसार में पैदा की है, उनकी अनुगूँज पाठकों में बराबर बनी रहेगी।

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